मैं अभी 50 साल का हूँ और मेरे दो बेटे हैं, जिनमें से छोटा शहर में रहता है और वहाँ अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए है, जबकि बड़ा बेटा अमित घर के पास ही रहता है और खेतों की सारी जिम्मेदारी संभालता है. तीन महीने पहले ही मैंने अमित की शादी करवाई थी, और बहू के घर आने से पहले जो सूना-सूना लगता था वो अब जीवंत और गर्माहट से भरा हुआ महसूस होता है, हर कोना जैसे हँसता-खिलखिलाता सा लगता है. बहू का नाम कमला है, और मैं उसे हमेशा बहू कहकर ही पुकारता हूँ, जबकि वो मुझे सम्मान से पिताजी कहती है, उसकी आवाज में वो मिठास जो दिल को छू जाती है. अमित को कुछ जरूरी काम से शहर जाना पड़ा, और जैसे ही वो गया, मेरी नजरें अनायास ही बहू पर टिकने लगीं, उसकी हर अदा, हर हलचल मुझे अपनी ओर खींच रही थी, जैसे कोई जादू सा हो गया हो.
शाम को अमित के जाते ही बहू अपने कमरे में आराम कर रही थी, और सोते हुए करवट बदलते वक्त उसका लहंगा धीरे-धीरे ऊपर सरक गया, उसकी गोरी जांघें नजर आने लगीं, जिनकी चिकनी त्वचा पर शाम की रोशनी पड़कर चमक रही थी, और मेरी नजर वहाँ ठहर गई, मेरे लंड में अचानक एक गर्माहट सी दौड़ गई, जैसे सालों की सोई हुई आग फिर से भड़क उठी हो.
थोड़ी देर बाद जब बहू उठी, तो मैंने खुद को उसके आसपास ही रखा, हर पल उसकी मौजूदगी का आनंद लेते हुए, उसकी खुशबू जो कमरे में फैली हुई थी, वो हल्की सी मिट्टी और फूलों की मिली-जुली महक मुझे और उत्तेजित कर रही थी. वो जब रसोई में खाना बना रही थी, तब भी मैं वहीं बैठा रहा, मेरी आँखें उसके शरीर पर घूम रही थीं, उसके बूब्स जो ब्लाउज में कसे हुए थे, उनकी गोलाई और हर सांस के साथ ऊपर-नीचे होना, और उसकी गांड की वो मटकती चाल जो हर कदम पर मुझे मदहोश कर रही थी, मैं बस नजरें टिकाए बैठा रहा, दिल की धड़कनें तेज होती जा रही थीं. खाना खाते वक्त भी मैंने अपनी नजरें उसके मम्मों पर ही चिपका रखी थीं, जैसे वो नरम-नरम गोले मुझे बुला रहे हों, उनकी छाया टेबल पर पड़ रही थी और मैं कल्पना में उन्हें छूने की सोच रहा था. अब बहू को भी अहसास हो गया था कि मैं उसे बुरी नजरों से देख रहा हूँ, उसकी आँखें कभी-कभी मुझसे मिलतीं और शरमा कर नीचे झुक जातीं, लेकिन उसमें एक अजीब सी उत्सुकता भी झलक रही थी. खाने के बाद मैंने बहू से बातें शुरू कीं, उसकी आवाज सुनकर मन और भी बेचैन हो रहा था.
मैं: बहू मुझे आज आधी रात को खेत पर जाना होगा. नहर में पानी आया हुआ है उसे खेतों में छोड़ के सिंचाई करनी है. क्या तुम भी मेरे साथ चलोगी?
बहू: पिताजी इतनी रात को जाना क्या ठीक होगा? वैसे मुझे अंधेरे से बहुत डर लगता है. और वो कह रहे थे कि हमारे खेत जंगल से सटे हुए हैं. रात में जा कर खतरे को मोल लेने जैसा है. सुबह को नहीं जा सकते हैं पिताजी?
मैं: नहीं बहू सुबह बहुत देरी हो जाएगी. अगर रात को पानी छोड़ा नहीं तो पानी किसी और के खेत में ले लेगा वो. और फिर हमें उसके खेत की सिंचाई पूरी खत्म होने की राह देखनी पड़ेगी. वैसे मैं साथ में हूँ फिर तुम्हें किसी से भी डरने की जरूरत नहीं है. मेरी तो पूरी लाइफ ही निकल गई इन खेतों में मैं चप्पे चप्पे से वाकिफ हूँ.
बहू: ठीक है पिताजी, जैसे आप को ठीक लगे. मैं आप के साथ चलूंगी.
अब हम दोनों रात को घर से निकले खेतों की तरफ, हवा में ठंडक थी लेकिन मेरे शरीर में एक अलग ही गर्मी दौड़ रही थी, चाँद की रोशनी हल्की-हल्की पड़ रही थी और जंगल की तरफ से जानवरों की दूर-दूर की आवाजें आ रही थीं. पांच मिनट चलने के बाद रास्ता और भी संकरा होता गया, दोनों तरफ घना जंगल था, पेड़ों की शाखाएँ सरसराती हुईं, और हवा में मिट्टी की नम खुशबू फैली हुई थी जो हमें घेर रही थी.
बहू: पिताजी मुझे डर लग रहा है.
मैं: डरो मत बहू मैं हूँ ना तुम्हारे साथ में ही. आओ मेरा हाथ पकड़ लो तुम.
ये कह के मैंने उसका हाथ पकड़ लिया, उसकी हथेली नरम और गर्म थी, जैसे रेशम सी छू रही हो, और मेरे स्पर्श से वो थोड़ा कांप गई, लेकिन मैंने उसे और कसकर पकड़ लिया. हम दोनों थोड़ी दूर गए थे कि मैं रास्ते में रुक गया, दिल की धड़कनें तेज हो गईं थीं.
बहू: क्या हुआ पिताजी आप रुक क्यों गए?
मैं: श्हह्हह्ह चुप रहो बहू. लगता है यहाँ आसपास कोई सांप है.
बहू को ये कहा तो वो और भी डर गई, उसकी सांसें तेज हो गईं, शरीर कांपने लगा, और मैंने मौके का फायदा उठाया और उसको अपने सीने से लगा लिया, उसकी गर्म सांसें मेरी छाती पर महसूस हो रही थीं, उसके मम्मे मेरी छाती पर दब रहे थे, उनकी नरमी और गर्माहट मुझे पागल कर रही थी. मैंने दोनों हाथ उसकी पीठ पर रख दिए और हाथों को पीठ पर रगड़ने लगा, उसकी पीठ की चिकनी त्वचा पर उँगलियाँ फिसल रही थीं, धीरे-धीरे नीचे की ओर जाते हुए, उसकी कमर की वक्रता को महसूस करते हुए, और वो मेरे कंधों पर सिर टिका कर खड़ी रही, उसका शरीर मेरे से चिपक रहा था, गर्मी का आदान-प्रदान हो रहा था.
फिर मैंने बहू के कान में कहा: बहू बस ऐसे ही शांत खड़ी रहो.
बहू: पिताजी मुझे सच में बहुत ही डर लग रहा है.
बहू ने दबी हुई आवाज में कहा, उसकी आवाज में डर के साथ एक कामुकता सी घुल गई थी. अब मैंने अपने दोनों हाथ को उसकी गांड पर रख दिए, और मैं हाथ की हथेलियों और उँगलियों से उसकी गांड को दबाने लगा, उसकी गांड की मांसलता इतनी नरम और भरी हुई थी कि उँगलियाँ धंस रही थीं, मैंने हल्के से दबाया फिर जोर से मसला, गांड की गोलाई को फैलाते हुए, और बहू के मुंह से अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह हम्म्म्म की आवाज निकली, जो रात के सन्नाटे में गूँज रही थी, और वो मेरे सीने से और भी लिपट गई, उसकी सांसें मेरे कान के पास आ रही थीं, गर्म और तेज, उसकी जांघें मेरी जांघों से रगड़ रही थीं. अब मैं बहू की गांड की क्रेक को अपनी उंगली से सहलाने लगा, उंगली को लहंगे के ऊपर से गांड की क्रेक में ऊपर से नीचे तक फेरने लगा, धीरे-धीरे दबाव बढ़ाते हुए, क्रेक की गहराई में उंगली को सरकाते हुए, उसकी गांड की गर्माहट उंगली पर महसूस हो रही थी, और बहू अब और मेरी पीठ पर अपने हाथ फेरने लगी, उसके नाखून मेरी पीठ पर हल्के से खरोंच रहे थे, ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह पिताजी आप ये क्या कर रहे हो? सांप गया कि नहीं?
मैं: लगता है कि सांप चला गया है.
बहू: पिताजी मुझे बहुत जोर से पेशाब आया है, लेकिन यहाँ तो सब तरफ जंगल ही जंगल है.
मैंने अपने हाथ को उसकी गांड से हटाते हुए कहा, जंगल है तो क्या हुआ तुम पेशाब कर लो यहीं पर. यहाँ पर कौन देखनेवाला है.
बहू ने दबी हुई आवाज में कहा, जी पिताजी, और फिर उसने अपने लहंगे को उतारा और वो वहीं पर बैठ गई रास्ते के किनारे, हवा में उसकी नंगी जांघों की ठंडक महसूस हो रही थी, उसकी जांघें गोरी और चिकनी थीं, हल्की कंपकंपी के साथ, और उसकी चूत से निकलते हुए पेशाब की धार से मेरे लंड में जैसे और भी मस्ती चढ़ी हुई थी, धार की आवाज रात में गूँज रही थी, गर्म और छन-छन करती हुई, पहले हल्की धार निकली फिर तेज हुई, जमीन पर गिरकर फैल रही थी, उसकी धार स्टार्ट हो के रुक गई और वो तीस सेकंड तक उठी नहीं, उसकी सांसें अभी भी तेज थीं, चेहरा लाल और शर्म से भरा हुआ था.
मैं: क्या हुआ बहुत पेशाब हुआ कि नहीं?
बहू: नहीं पिताजी, डर की वजह से आधा ही हुआ और रुक गया.
मैं बहू के करीब गया और लालटेन के उजाले को उसकी चूत के ऊपर मारा, उसकी चूत की गोरी त्वचा पर रोशनी पड़कर चमक रही थी, हल्के बालों वाली, गीली और नम, लेबिया थोड़ी फूली हुईं, और फिर अपनी उंगली को मैंने बहू की चूत के ऊपर रख दिया और उसे सहलाने लगा, उंगली की नोक से उसकी चूत की दरार को छूते हुए, ऊपर से क्लिट पर रुककर हल्का दबाया, गर्माहट और नमी महसूस हो रही थी, मैंने उसे कहा, अब कोशिश करो बहू. बहू ने अपनी आँखें बंद कर दी, उसका चेहरा लाल हो रहा था. मैं अपनी उंगली उसकी चूत के ऊपर से नीचे तक रगड़ने लगा, धीरे-धीरे दबाव बढ़ाते हुए, उसकी क्लिट को छूते हुए, क्लिट को उंगली से गोल-गोल घुमाया, फिर दरार में नीचे सरकाया, और वो सहम गई थी और ओह अहह पिताजी अच्छा लग रहा है ऐसे कहने लगी, उसकी आवाज में डर और उत्तेजना का मिश्रण था, उसकी कमर हल्की उछल रही थी.
और फिर बहू का पेशाब मेरी उंगली के ऊपर फव्वारे के जैसे छूट गया, गर्म धार उंगली पर गिर रही थी, चिपचिपी और तेज, पहले हल्की फिर जोरदार, मैंने उंगली चूत पर रगड़ना चालू रखा, हर रगड़ से उसकी कमर हिल रही थी, धार उंगली को भिगो रही थी. उसका पेशाब होते ही मैंने गमछा निकाला और उसकी चूत को पोंछ दिया, गमछे की रगड़ से वो और सिहर उठी, गमछा उसकी लेबिया पर फेरा, नमी सोखते हुए, मैंने फिर उँगलियों को कस दिया उसकी चूत पर और जोर से मसल दिया उसकी चूत को, उँगलियाँ उसकी लेबिया को दबा रही थीं, गर्म और गीली, बीच की उंगली दरार में डाली हल्की सी, बहू चिल्ला उठी, अह्ह्ह्हह पिताजी, उसकी आवाज में दर्द और मजा दोनों थे. मैंने उसको साइड में लेट जाने को कहा, और उसके करीब लेटकर मैंने उसके होंठों पर अपने होंठों को लगा दिया और चूसने लगा, उसके होंठ नरम और रसीले थे, जैसे शहद से भरे हों, मैं उन्हें चूसते हुए उनकी मिठास महसूस कर रहा था, पहले ऊपरी होंठ को चूसा, फिर नीचे वाले को मुंह में खींचा.
उसके नीचे के होंठों को मैंने अपने दांतों से काट लिया, हल्का सा दबाकर, और वो सिसकारी भर उठी, आह्ह, फिर मैंने उसे कहा, तुम अपनी जीभ बाहर निकालो ना बहू. बहू ने अपनी जीभ बाहर निकाली और मैंने अपने होंठों से उसकी जीभ का बेस्वादा स्वाद चखा और फिर उसे चूसने लगा, उसकी जीभ गर्म और लचीली थी, मैं उसे अपने मुंह में खींच रहा था, जीभ से जीभ रगड़ते हुए, थूक मिलाते हुए, बहू ने भी अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन पर डाल दिया, उसके नाखून मेरी पीठ पर गड़ रहे थे. अब मैंने उसकी जीभ को अपने मुंह में ले लिया और अपने होंठों को जोर से बंद किया और उसकी जीभ को बहुत प्यार देने लगा, चूसते हुए, थूक का आदान-प्रदान हो रहा था, जीभ को घुमाते हुए, अब मैं और बहू दोनों ही अह्ह्ह्ह अह्ह्ह हम्म्म करने लगे थे, हमारी सांसें मिल रही थीं, गर्म और भारी. अब बहू ने कहा, पिताजी आप का थूक बड़ा ही स्वादिष्ट है. मैंने कहा, मेरा तो सब कुछ स्वादिष्ट है बहू रानी.
बहू ने कहा, तो फिर आज अपनी बहू को सब कुछ का स्वाद दे दीजिए पिताजी.
मैंने अब बहू की चोली खोल दी, उसके मम्मे आजाद होकर बाहर आ गए, गोरे और भरे हुए, निपल्स सख्त हो चुके थे, मैं उसकी गर्दन को चूमते हुए मैं उसे जीभ से चाटने लगा, गर्दन की नरम त्वचा पर जीभ फेरते हुए, ऊपर से नीचे तक, उसकी खुशबू नाक में भर रही थी, पसीने और औरत की मिली हुई, फिर कंधों पर चूमा. उसके मम्मों पर दोनों हाथ रगड़ने लगा, हाथों से उनकी गोलाई को महसूस करते हुए, नरम मांस को दबाते हुए, पहले हल्के से सहलाया फिर जोर से दबाया, उँगलियों को कसने लगा उसके मुलायम मम्मों के ऊपर, हर दबाव से वो सिसक रही थी, मम्मे हाथों में उछल रहे थे. ओह्ह्ह्ह फ्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह पिताजी और जोर से दबाओ ना, बहू ऐसे कहने लगी चुदासी आवाज में, उसकी आँखें बंद थीं और कमर उछल रही थी. ये सुनकर मैंने उसके मम्मों को जोर जोर से दबाना चालू कर दिया, उँगलियाँ धंस रही थीं, मम्मों को मसलते हुए ऊपर उठाया फिर छोड़ा, और मम्मे दबाते हुए मैंने अपनी थूक उसके मुंह में डाल दी, थूक की धार उसके होंठों पर गिरी, और मैंने फिर से किस किया.
बहू ने अपनी जीभ से थूक को स्वैलो कर लिया, अह्ह्ह अह्ह्ह पिताजी बड़ा मजा आ रहा है, उसकी आवाज में कामुकता छलक रही थी.
मैंने अब उसके निपल्स को उँगलियों के बीच में रगड़ने लगा, उन्हें पिंच करते हुए, घुमाते हुए, पहले एक निपल को उँगलियों से खींचा फिर दूसरे को, निपल्स सख्त और गर्म हो गए थे, उसके निपल्स पर चिमटी लगाने लगा, हल्का दर्द देते हुए, खींचते हुए. वो आह्ह्हह्ह अह्ह्ह कर के चिल्लाने लगी, उसकी सिसकारियाँ रात में गूँज रही थीं. अब मैंने उस से कहा, बहू जरा उठकर थूक दो अपने मम्मों पर. उसने उठकर अपने मम्मों को अपने मुंह के करीब किया और दोनों मम्मों के ऊपर थूक दिया, थूक की बूंदें उनके ऊपर चमक रही थीं, फैल रही थीं. मैंने उसको फिर से लिटा दिया और अब मैं उसके दोनों मम्मों को चूसने लगा अपने होंठों से, होंठों से उन्हें दबाते हुए, चूसते हुए, उनके स्वाद को महसूस करते हुए, पहले बाएं मम्मे को मुंह में लिया, चूसा, जीभ से निपल घुमाया, फिर दाएं को, अपने मुंह को खोलकर मम्मों पर जोर से प्रेस किया और फिर मुंह को बंद कर के उसके मुलायम मम्मों को काटने लगा धीरे धीरे से, दांतों से हल्का काटते हुए, निपल को दांतों के बीच दबाया. मेरे दांतों के निशान पड़ गए थे उसके मम्मों पर, लाल हो गए थे. उसने मुझे अपनी छाती पर जकड़ लिया जोर से, उसके हाथ मेरी पीठ पर कसकर दब रहे थे, ऐसे जैसे मुझे जाने ही नहीं देना चाहती हो. फिर मैंने उसके एक निपल को चूसना चालू कर दिया, जीभ से घुमाते हुए, चूसते हुए, जोर से खींचते हुए, ओह पिताजी अह्ह्ह्ह चूस लो अपनी बहू की चुचियों को, उसकी आवाज में वासना भरी थी.
मैंने उसे कहा, चूस रहा हूँ रंडी.
बहू ने कहा, आप को अच्छी लगी अपनी रंडी बहू की जवानी पिताजी?
अब मैं उसकी चुचियों पर अपनी जीभ फेरने लगा सर्कल्स में, जीभ की नोक से हर हिस्से को छूते हुए, निपल के चारों ओर घुमाया, फिर जीभ पूरी मम्मों पर फेरकर मैंने उसकी थूक चाट ली उसके मम्मों के ऊपर से, थूक का नमकीन स्वाद मुंह में घुल रहा था, मम्मों को चाटते हुए नीचे की ओर गया.
अब मैं थोड़ा नीचे आ गया और मैंने उसके पेट को चूमना शुरू कर दिया, उसके सपाट पेट पर होंठ फेरते हुए, गर्म सांसें छोड़ते हुए, पेट की त्वचा पर जीभ से लाइन खींची, मैंने उसके नेवेल में जीभ डालकर जीभ को घुमाया सर्कल्स में और फिर नेवेल पर दांत कसकर उनको काटने लगा, हल्का सा खींचते हुए, नेवेल के किनारों को चूसा. अह्ह्ह्हह औह्ह्ह्हह्ह अह्ह्ह्ह हम्म्म्म पिताजी आप को रंडियों से खेलना खूब अच्छी तरह से आता है, उसकी आवाज में मजा और प्रशंसा थी. अब मैंने बहू का लहंगा निकाल लिया और उस से कहा कि वो कुतिया बन जाए. बहू तुरंत अपने घुटनों के और हथेलियों के ऊपर खड़ी हो गई, उसकी गांड ऊपर उठी हुई थी, चाँद की रोशनी में चमक रही थी, गांड की क्रेक साफ नजर आ रही थी. मैंने उसकी कच्छी निकाली और उसकी गांड पर हाथ फेरने लगा, हाथों से उसकी गोलाई को सहलाते हुए, ऊपर से नीचे फेरा, मांस को दबाते हुए, गांड के चूतड़ों को अलग किया फिर जोड़ा. वो मुड़कर मुझे देखकर हौले से हंस पड़ी, उसकी हंसी में शरारत थी, और बोली, पिताजी कैसी लगी आप को आप की रंडी की गांड? मैंने उँगलियों को कस कर उसकी गांड पर दबाया और कहा, बहुत अच्छी गांड है तेरी मेरी छिनाल बहुत दिनों से तेरे मम्मे और गांड ही देख रहा था मैं, उसकी गांड की गर्माहट हाथों में समा रही थी.
बहू ने कहा, अब से ये रंडी आप की ही है पिताजी.
मैं उसकी गांड को दबाने लगा, जोर जोर से मसलते हुए, चूतड़ों को फैलाते हुए, फिर गांड पर जोर जोर से मुंह दबाया और उसको चूमने लगा, होंठों से चूसते हुए, पहले एक चूतड़ को चूमा फिर दूसरे को, अह्ह्ह्हह अह्ह्ह्ह मुआअहाआअ, उसकी गांड की खुशबू नाक में भर रही थी, मिट्टी और पसीने की. फिर मैंने अपने दांत गाड़ दिए उसकी मांसल गांड के ऊपर, काटते हुए, दांतों के निशान छोड़ते हुए. अब मैंने उसके चूतड़ खोले और उसकी गांड की छेद के ऊपर थूक दिया, थूक की बूंद छेद पर गिरी और फैल गई, छेद को गीला कर दिया. वो कांपने लगी थी, शरीर में कंपन दौड़ रहा था. मैंने अब अपनी उंगली से उसकी गांड के छेद के ऊपर के थूक को मलना चालू कर दिया, उंगली घुमाते हुए, छेद को सहलाते हुए, हल्के से दबाया फिर गोल-गोल घुमाया.
बहू ने गांड को थोड़ा हिला के कहा, पिताजी मेरी गांड में अपनी उंगली डाल दो ना. मैंने उंगली को जोर जोर से छेद पर पुश किया और फिर उंगली डाल दी अपनी बहू की गांड में, उंगली अंदर घुसते हुए गर्म और टाइट महसूस हो रही थी, पहले आधा इंच डाला फिर पूरा, उंगली को बेंड किया उसकी गांड में और फिर हिलाने लगा उसको जोर जोर से, अंदर-बाहर करते हुए, गांड की दीवारों को रगड़ते हुए. अब उंगली को गांड से अंदर बाहर करने लगा था मैं, हर मूवमेंट से बहू आह्ह्ह इह्ह ओह्ह, पिताजी उंगली और गहराई में डालो, गांड में जलन हो रही है मगर मजा आ रहा है, उसकी आवाज में दर्द और उत्तेजना थी, मैंने उंगली और तेज हिलाई, गांड की दीवारों को छूते हुए, उसकी गांड की गर्माहट उंगली पर लिपट रही थी, दूसरी उंगली भी जोड़ी हल्के से.
मैंने फिर उसे कहा, अब तेरी चूत की बारी है बहू.
इतना सुनते ही उसने दोनों पैरों को फैला लिया और मेरा हाथ लेकर अपनी चूत पर रखवा दिया, उसकी चूत पहले से गीली हो चुकी थी, रस टपक रहा था, गर्म और चिपचिपा.
फिर वो बोली, आप की छिनाल आप के लिए सब कुछ करेगी पिताजी. जो चाहे कर लो आप मेरे स्वामी.
मैंने उंगली को बहू की चूत में डाली और जोर जोर से धक्का दिया अंदर घुसाते हुए, उंगली अंदर जाते हुए उसकी चूत की टाइटनेस महसूस हो रही थी, गर्म और चिपचिपी, पहले एक उंगली फिर दो, दीवारों को फैलाते हुए.
वो तड़प उठी और अपने जिस्म को एकदम टाइट कर लिया उसने. मैंने उंगली को अंदर बाहर मूव किया उसकी चूत में, जोर जोर से हिलाया उसकी चूत में, हर धक्के से चूत का रस उंगली पर लग रहा था, चूत की दीवारों को रगड़ते हुए, जी स्पॉट को छूते हुए. फिर मैंने उंगली उसकी क्लिटोरिस के ऊपर रगड़ी, क्लिट को दबाते हुए, घुमाते हुए, उसकी क्लिटोरिस जोर से प्रेस की और उंगली को हिलाने लगा क्लिटोरिस के ऊपर प्रेस करते हुए, गोल-गोल फिर ऊपर-नीचे. वो आह्ह्ह अह्ह्ह ओह अह्ह्ह्हह हम्म्म कर के मोअन करने लगी थी, उसकी कमर उछल रही थी, हाथ जमीन पर कसकर पकड़े हुए थे. मैंने उंगली निकाली और उसके मुंह में डाल दी, वो मेरी उंगली को जोर जोर से चूसने लगी, अपनी चूत के रस का स्वाद चखते हुए, जीभ से उंगली को चाटते हुए. फिर मैंने उसके पैरों में झुक के उसकी चूत को चाटना चालू कर दिया, जीभ से दरार को चाटते हुए, ऊपर से नीचे, रस को चूसते हुए, क्लिट पर जीभ की नोक फेरी, चूत पर मुंह प्रेस कर के जोर जोर से चूसने लगा मैं, उसकी चूत की खुशबू और स्वाद मुंह में घुल रहा था, नमकीन और मीठा, लेबिया को मुंह में खींचा. वो बोली, पिताजी और जोर जोर से चाटो अपनी इस रंडी के बुर को. अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह ओह ओह मजा आ गया पिताजी इसको चटवा के.
अब मैंने अपना मुंह खोल दिया और चूत पर जोर से प्रेस किया, मुंह को बंद करते ही मेरे होंठों ने उसकी चूत को स्क्विज किया मुंह में, चूत की लेबिया मुंह में दबी हुईं, चूसते हुए खींचा. आह्ह्ह मर गई अह्ह्ह्हह ओह पिताजी आप बहुत बड़े चोदू हो अह्ह्ह्ह. मैंने अब उसकी चूत को दांतों से काटना शुरू किया धीरे धीरे से, हल्का काटते हुए, लेबिया पर दांत लगाए, फिर जीभ को चूत की दरार में ऊपर नीचे फेरा, उसकी चूत के रस को चाटा जो गीला और नमकीन लग रहा था, बहू की कमर उछल रही थी हर चाट पर, आह्ह इह्ह ओह्ह पिताजी जीभ अंदर डालो ना, चूत में आग लगी है. मैंने जीभ को चूत के छेद में घुसाया और घुमाया, अंदर-बाहर करते हुए, जीभ को मोड़कर दीवारों को चाटा, वो कांप उठी, उसके हाथ मेरे बालों में घुसे और सिर को चूत पर दबाने लगी, उसकी सिसकारियाँ तेज हो गईं, चूत का रस मुंह में बह रहा था, मैंने और जोर से चाटा, क्लिट को चूसा.
फिर मैंने अपनी धोती खोली. अपना लंड निकाला और अपने टोपे के ऊपर हाथ घुमाया, टोपा गिला हो गया था प्री-कम से, चिपचिपा और गर्म, लंड की नसें फूली हुईं थीं. मैंने टोपा बहू की चूत पर रगड़ा, ऊपर-नीचे फेरते हुए, क्लिट को छूते हुए, टोपे से दरार में दबाया. अह्ह्ह उम्म्मम्म पिताजी मैं अब इस लंड की दीवानी हूँ, रोज पूजा करूँगी इस लंड की.
मैंने लंड को चूत में पुश किया और फिर जोर से धक्का दिया बहू की कमर को पकड़ कर, कमर की गर्म त्वचा हाथों में दबी हुई, पहले टोपा अंदर डाला, चूत की दीवारें फैल रही थीं.
बहू दर्द से चिल्ला उठी, अह्ह्ह्ह पिताजीईईईईईईइ अह्ह्ह्हह आप का तो बहुत बड़ा है बाप रे, मेरी उतनी नहीं चूदी है अह्ह्ह्ह. धीरे से करो पिताजी.
मैंने उसके बाल पकड़ के कहा चुप कर साली हरामजादी.
मैंने अब उसकी चूत को चोदना चालू कर दिया, लंड अंदर बाहर हो रहा था, हर धक्के से चूत की दीवारें लंड को जकड़ रही थीं, पहले धीरे फिर तेज, लंड को आधा बाहर निकाला फिर पूरा अंदर. सन्नाटे में चुदाई की आवाज साफ साफ सुनाई दे रही थी. ठप ठप ठप, जांघों के लड़ने से और चूत और गांड के संगम स्थान से चिपचिपी आवाजें आ रही थी, पच पच की ध्वनि गूँज रही थी. मेरा पूरा लंड उसकी चूत में घुस के बाहर होता था जिसे मैं फिर से वापस अपनी बहू की चूत में डाल देता था, हर थ्रस्ट में गहराई तक जा रहा था, टोपा जी स्पॉट को हिट कर रहा था. बहू ने नीचे जमीन के ऊपर की सूखी हुई घास को पकड़ा था और वो भी अपनी गांड को हिला के मेरा लंड ले रही थी अपनी चूत के अंदर, उसकी कमर मेरे धक्कों के साथ ताल मिला रही थी. वो अपनी कमर हिला रही थी मेरे झटकों के साथ में, हम दोनों के शरीर पसीने से चिपचिपे हो गए थे.
मैंने लंड अंदर तक डाल के उसे एकदम जोर जोर से चोदा, मेरे लंड का टोपा उसकी चूत के मसल को हिट कर रहा था एकदम जोर से, हर हिट से वो चीख रही थी, चूत का रस लंड पर लिपट रहा था. वो अब मजे से चिल्ला रही थी, और जोर जोर से चोदो मुझे पिताजी. मैंने उसके ऊपर झुक गया थोड़ा सा और उसके मम्मों को पकड़ कर दबाने लगा जोर जोर से, मम्मे हाथों में मसलते हुए, निपल्स को पिंच करते हुए. फिर मैं रुक गया और जोर से पुश किया अपने लंड को बहू की चूत के अंदर. उसके मम्मे एकदम जोर से मसल दिए और मेरा लावा उड़ेल दिया उसकी चूत के अंदर ही मैंने, गर्म वीर्य की धारें चूत में भर रही थीं, एक के बाद एक स्पर्ट, चूत को भरते हुए.
कुछ देर तक बहू की चूत में लंड को रहने दिया, वीर्य की गर्माहट महसूस हो रही थी. फिर मैंने अपना लंड बाहर निकाला और बहू को दे दिया. उसने मुझे खींचकर अपने ऊपर लिटा दिया. कुछ सेकंड्स के बाद वो बोली, बाबू जी आप मेरी चूत में ही झड़ गए हो, कहीं मैं पेट से हो गई तो? मैं बोल पड़ा, तो क्या तुम मेरे लंड से संतान नहीं चाहती हो. वो बोली, आप को कोई दिक्कत तो नहीं है ना इसमें? मैंने कहा, मैं तो अब तुझे रोज चोदूंगा घर पर और अपने पोते को खुद पैदा करूंगा. वो बोली, फिर तो मैं आप के वीर्य से ही बालक पैदा करूँगी पिताजी.